शुक्रवार 3 जुलाई 2026 - 14:53
इमाम हुसैन (अ) के विरोधी धार्मिक नहीं, बल्कि दुनियापरस्त और धर्म से दूर लोग थे: आयतुल्लाह फ़ाज़िल लंकरानी

हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम के के वरिष्ठ शिक्षक आयतुल्लाह मुहम्मद जवाद फ़ाज़िल लंकरानी ने कहा है कि यह कहना कि इमाम हुसैन (अ) के मुकाबले में आने वाले लोग धार्मिक थे, कर्बला और आशूरा की घटना की एक बड़ी ऐतिहासिक विकृति है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वयं इमाम हुसैन (अ) ने अपने विरोधियों को धर्म का नहीं, बल्कि दुनिया का गुलाम बताया है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, क़ुम में हुसैनिया "बू-ए-सीब हुसैनी" में 17 मुहर्रम की मजलिस को संबोधित करते हुए हौज़ा-ए-इल्मिया क़ुम के शिक्षक और जामेआ-ए-मुदर्रिसीन के सदस्य आयतुल्लाह मुहम्मद जवाद फ़ाज़िल लंकरानी ने कहा कि मजालिस-ए-अज़ा में भाग लेना अहले बैत (अ) के दुश्मनों से व्यवहारिक रूप से असंबंध घोषित करना और अल्लाह तआला के निकट होने का एक माध्यम है।

उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन (अ) ने अपने आंदोलन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए फरमाया था कि जब सत्य पर अमल न किया जाए और असत्य का प्रभुत्व हो जाए, तो मोमिन को शहादत के लिए तैयार रहना चाहिए। आज भी दुनिया में ज़ायोनी शासन द्वारा किए जा रहे अत्याचार इसी सच्चाई की याद दिलाते हैं।

आयतुल्लाह फ़ाज़िल लंकरानी ने इमाम हुसैन (अ) के इस कथन का उल्लेख किया: "लोग दुनिया के गुलाम हैं और धर्म केवल उनकी ज़बान तक सीमित है। परीक्षा के समय सच्चे धार्मिक लोग बहुत कम रह जाते हैं।" उनके अनुसार यही कथन इस बात का प्रमाण है कि कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के विरोधी धर्म के लिए नहीं, बल्कि अपने सांसारिक हितों के लिए मैदान में उतरे थे।

उन्होंने कहा कि कुछ लोग यह धारणा बनाने की कोशिश करते हैं कि धार्मिक लोगों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के खिलाफ युद्ध किया था, ताकि यह साबित किया जा सके कि धर्म का राजनीति से कोई संबंध नहीं है। जबकि यह दावा ऐतिहासिक तथ्यों और स्वयं इमाम हुसैन (अ) के कथनों के विपरीत है।

उन्होंने आगे कहा कि दुनियापरस्ती और लालच के कारण लोगों ने हज़रत मुस्लिम बिन अकील (अ) का साथ छोड़ दिया और इब्न ज़ियाद ने क़बीलों के सरदारों को रिश्वत देकर अपने पक्ष में कर लिया। उनके अनुसार शहीद मुतह्हरी ने भी कर्बला की घटना से जुड़ी इस ऐतिहासिक विकृति की ओर ध्यान दिलाया था।

आयतुल्लाह फ़ाज़िल लंकरानी ने कहा कि आज इमाम ख़ुमैनी (र), रहबर-ए-शहीद और शहीदों के ख़ून की बरकत से ईरान की जनता धर्म पर दृढ़ता से कायम है और यही आशूराई भावना देश की सफलता और स्वतंत्रता का रहस्य है।

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